जब भी टूटना हो अकेले में टूटना,
जब तक साँसे है कोई कंधा नहीं देता।
तमाशाबीन है ये कमबख्त दुनियां,
थके हुए बदन को है बदनाम कर देता।।
मैं भी एक मुसाफिर इस जमाने में,
गाँव-गली शहर से गुजरता चला गया।
सराये में जब भी की कोशिश मैंने,
अक्सर कोई वहाँ..बहाना किया गया।।
दरवाजे पर...दिल की दस्तक हुई,
जाकर देखा तो साँसों का झोंका था।
यही आखिर सच है.....जमाने का,
दिल ने ही कई बार....मुझे टोका था।।
जिंदगी के अंजुमन...का दस्तूर है,
जीने का सलीका....सिखाते जा रही।
आवाज है.....रुहानियत की सुनो,
देव जो हर सुबह वक़्त पर जगा रही।।


