कुदरत के खेल अनोखे,
हँसकर कितने जीव अंश गढ़े।
सुख - दुःख के तागों से,
है जिन्होंने जीवन-चादर बुने।।
बनाया धरती नील गगन,
सुदूर-व्योम में कौन तारे गने।
श्वास-श्वास में इंसानों के,
जो स्वयं हृदय के प्राण बने ।।
उल्लासित पुरवाई आँगन,
विवस्वान कुदरत दिनेश बने।
शीतलता के प्रतिमान रूप,
कलानिधि सारंग राकेश बने।।
बहती तीव्र जीवन सरिता,
सभ्यता- भाषा के गीत बुने।
कुदरत तेरी कलम जाने
न्यारे- न्यारे कितने रंग चुने।।
धवल हिमगिरि के श्रृंगों में
सदाशिव का नित ध्यान लगे।
जीवन की प्रतिकूलता में,
बन दृढ़ वट सा विश्वास जगे।।
सर सरिता तीर्थ मनोरम,
मानवता के जलयान चले ।
कुदरत तेरे रूप निराले,
देव सदृश तेरा विधांत पले।।

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