शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

किताब

 किताब

कितने ही रंग बिखरे पड़े हैं
जिंदगी के किताब में मेरे
कभी पावस कभी पतझड़
कभी बसंत के रूप घनेरे
बारिश की रिमझिम फुहारें
जीवन उपवन में टपकते
कितने ही मृदुल निर्झरिणी
बन के अमृत मानों उतरते
जिंदगी के किताब पर मेरे
गेह आत्मा का आभास
शब्दों की अंतर- अनुरक्ति
दिव्यता का नेह प्रभास
पृथक-पृथक रूप आकार
परिभाषित काव्य सार
स्पंदित शेष स्मृति पटल पर
परिलक्षित अक्षर साकार
मन के भाव बन पंछी चित्रित
जिंदगी के किताब नीड़
देव शब्द खेलती अठखेलियाँ
अधीर पर अवलंबन रीढ़
स्वरचित मौलिक रचना
✍🏻 देवेन्द्र हिरवानी
कन्हारपुरी वार्ड नं 34
राजनांदगांव(छ.ग.)









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