शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

किताब

 किताब

कितने ही रंग बिखरे पड़े हैं
जिंदगी के किताब में मेरे
कभी पावस कभी पतझड़
कभी बसंत के रूप घनेरे
बारिश की रिमझिम फुहारें
जीवन उपवन में टपकते
कितने ही मृदुल निर्झरिणी
बन के अमृत मानों उतरते
जिंदगी के किताब पर मेरे
गेह आत्मा का आभास
शब्दों की अंतर- अनुरक्ति
दिव्यता का नेह प्रभास
पृथक-पृथक रूप आकार
परिभाषित काव्य सार
स्पंदित शेष स्मृति पटल पर
परिलक्षित अक्षर साकार
मन के भाव बन पंछी चित्रित
जिंदगी के किताब नीड़
देव शब्द खेलती अठखेलियाँ
अधीर पर अवलंबन रीढ़
स्वरचित मौलिक रचना
✍🏻 देवेन्द्र हिरवानी
कन्हारपुरी वार्ड नं 34
राजनांदगांव(छ.ग.)









कुदरत

 

कुदरत के खेल अनोखे,
हँसकर कितने जीव अंश गढ़े।
सुख - दुःख के तागों से,
है जिन्होंने जीवन-चादर बुने।।
बनाया धरती नील गगन,
सुदूर-व्योम में कौन तारे गने।
श्वास-श्वास में इंसानों के,
जो स्वयं हृदय के प्राण बने ।।
उल्लासित पुरवाई आँगन,
विवस्वान कुदरत दिनेश बने।
शीतलता के प्रतिमान रूप,
कलानिधि सारंग राकेश बने।।
बहती तीव्र जीवन सरिता,
सभ्यता- भाषा के गीत बुने।
कुदरत तेरी कलम जाने
न्यारे- न्यारे कितने रंग चुने।।
धवल हिमगिरि के श्रृंगों में
सदाशिव का नित ध्यान लगे।
जीवन की प्रतिकूलता में,
बन दृढ़ वट सा विश्वास जगे।।
सर सरिता तीर्थ मनोरम,
मानवता के जलयान चले ।
कुदरत तेरे रूप निराले,
देव सदृश तेरा विधांत पले।।
✍🏻 देवेन्द्र हिरवानी
कन्हारपुरी वार्ड नं 34
राजनांदगांव(छ.ग.)






पहचान


मेरे शब्द ही मेरी पहचान का गीत बने,
मेरा व्यवहार ही जमाने में प्रतिबिंब बने।
शब्दों में भाव की अभिव्यक्ति विशिष्ट,
काव्य- रस छंदो में सार्थक कर्तव्यनिष्ठ।।
निज अस्तित्व आव्हान धवल- चरित्र,
व्यक्तित्व विस्तार द्रवित संवेदना पवित्र।
कागज पर अंकित गहन भाव चित्रित,
संयमित जीवन प्रखर स्वर अभिमंत्रित।।
सत्य - पथ के बटोही प्रबुद्ध पहचान,
नवचेतना में नवल युग का नव निर्माण।
राह- अनगिनत विरचित शिल्पकार,
भेदता गगन लक्ष श्रम-बिंदु अविष्कार।।
मूल- स्वभाव मानवी- मन का प्राण,
चित्त का अवधान करे प्रकट पहचान।
मन की फकीरी में गढ़े देव प्रतिमान,
अस्मिता सर्जन संकल्पित उदीयमान।।
शांत -प्रवाह न कोई उन्मुक्त उन्माद,
हिय धड़कन में स्वर-व्यंजन अनुवाद।
औदार्य संचित सौंदर्य सार देव गीत,
क्षणिक पहचान पल लिख अमरगीत।।
✍🏻 देवेन्द्र हिरवानी
कन्हारपुरी वार्ड नं 34
राजनांदगांव(छ.ग.)